Friday, October 1, 2010

आज महफ़िल है सजी, हर तरफ बरसता रंग है,
कैसे मनाएं हम ख़ुशी, मुफ़लिसी हमारे संग है/

भूख से व्याकुल वो जमघट, है इकठ्ठा द्वार पर,
विकास के दावे पे उनके ये करारा व्यंग्य है/
उधर सुलगता पूर्वोत्तर इधर सिसकता है विदर्भ,
और वहां वेतन का मुद्दा, मचा रहा हड़कंप है/
आज हरियाली पे अपनी मंडरा रहा है लाल साया,
उनको माओ का कहर, लगता मामूली हुडदंग है/
है राष्ट्र आज बाँट रहा, भाषायी आधार पर,
कहते,, नहीं राष्ट्र से लेना देना ये महाराष्ट्र की जंग है/
देखना वाजिब नहीं, मत देख बेजुबानों की तरफ,
खुद खोल ले अपनी जुबां जिस पर लग चुकी ज़ंग है/
हिल उठेंगे वो सिंहासन, ज़रा जोर से हुंकार दे,
और चले मालूम उन्हें, यहाँ पर लोकतंत्र है/

1 comment:

  1. kya kehne yaar... maza aa gaya padh kar... :)

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