Monday, August 6, 2012

उसके मेरे बीच कुछ नज़दीकियाँ आतीं|
काश मुझे ग़ज़ल की बारीकियां आतीं|

दरवाज़े खरीदता है संगदिल शहर सारा,

नरमदिली आती गर खिड़कियाँ आतीं|

गुल भी यहाँ कांच के मोहताज हो गए,

समझे! यहाँ क्यों नहीं तितलियाँ आतीं|

जो दो वक़्त की चाय पी लेते संग उनके,


क्यों बेवक्त उन चेहरों पे झुर्रियां आतीं|

गर ग़ुरूर पे काबू और जेब ढीली रखते,

भटकना न पड़ता जब सर्दियां आतीं|

~ललित किशोर गौतम
जो मैं होता शहंशाह तो मेरा भी हरम होता|
दीदार-ए-हुस्न को हर रोज़ इक सनम होता|

मुझको शिकायत नहीं कि दर्द हिस्से आया,

उसे भी देता तो इस दर्द का असर कम होता|

हरचंद कोशिश की पर अंजाम सिफ़र निकला,

महबूब तो तब होता जब ये लहज़ा नरम होता|

घुटकर मरते हैं हम जब भी डी.बी. जाते हैं,


ए खुदा तेरा मुझपर थोडा तो करम होता|

मसला है, कि लम्बी उमर बितानी है अभी,

मैं कुछ नहीं कहता गर राहिए अदम होता|

~ललित किशोर गौतम
मैं अपने झोंपड़े को भी महल कहता हूँ|
टूटी फूटी ही सही पर ग़ज़ल कहता हूँ|

मुहब्बत के फ़साने सुनने की खातिर,

वो जहन्नुम कहता है मैं चल कहता हूँ|

कुछ दिन हुए समंदर किनारे खिला है जो,

उसे सियासत की कीचड़ का कमल कहता हूँ|

दरअस्ल मेरा मिज़ाज ही कुछ ऐसा है,


वरना शेर तो मैं काफी सरल कहता हूँ|

~ललित किशोर गौतम
एक अरसा हो गया गाँव को देखे|
उन कच्चे रास्तों को
जो सुना है पक चुके हैं|
वो बम्बा जिसमें पानी की जगह
मूंज ठाड़ी है|
गाँव जाने के रास्ते में पड़ता
वो दुमंजिला टुअल|
वो बाग़ जहाँ खाने को चूरन
धोये थे आलू|
वो मरघट जिसकी कब्रों पर

कच्चे अनार खाए थे दुबककर|
घर के सामने वो चबूतरा
जहाँ जाड़े की रात में खाट पर लेटे
बाबा ने बताया था सप्तऋषियों को|
और याद आता है
वो अम्मा से छिपकर दोस्तों संग
घर घर जाना टेसू लेकर|
वो पातीराम धोबी
चुराकर पी थी जिसकी बीड़ी|
वो गूलर का पेड़
जिसके गूलरों में
हर साल लग जाते थे कीड़े|
वो पोखर जहाँ अपनी भैंसों
संग हम भी नहाते थे|
वो तेलिया जिसकी टोली का हत्था
फेंका था कुँए में|
संकरपुर का वो टेलर जिसने
फैशन वाली बेलबाटम पेंट
सिली थी तीस रुपये में|
वो लंगड़ा नाऊ जिसके डब्बे में
जया प्रदा की तस्वीर थी|

जाऊँगा किसी दिन तथाकथित सभ्य बनकर

सारे असभ्य जो बसते हैं वहां|
 
~ललित किशोर गौतम
बात बात में झगडा होता|
न होती रंजिश अच्छा होता|


भरी किताबें कमरा होता,
और नहीं दरवाज़ा होता|


गर बाबा मेरे ज़िन्दा होते,
मीर जैसा लहज़ा होता|


इन्द्रधनुष भी सध जाता,
सूरज थोड़ा ठहरा होता|


हुनर दिखाने को अपना,
पानी ये नाकाफ़ी है,
उंगली दांतों तले दबाते तुम,
बस ये दरया थोडा गहरा होता|


~ललित किशोर गौतम
सब सूखे फूल माली नईं|
क्या देश में कोई सवाली नईं|


बाप ने की जूतमपैजार,
दुआ है वो गाली नईं|


सन्डे घूमो डीबी तुम,
बाद कहो हरियाली नईं|


फ़साने इश्क़ में गढ़ते हम,
पर मंजूर बटुआ खाली नईं|


पर्दों के पैबंद हटाते हैं,
यों मिलतीं हमको ताली नईं|


~ललित किशोर गौतम